𝗣𝗹𝗮𝗻𝗲𝘁 𝗡𝗲𝘄𝘀 𝗧𝗶𝗺𝗲𝘀

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धर्मशाला में बहुमंजिला निर्माण के बजाय छोटे निर्माण पर करना होगा फोकस : डॉ. महाजन

एहतियाती कदम न उठाये तो दस साल बाद बड़े नुकसान की संभावना

भूकंप और भूस्खलन अनुसंधान विशेषज्ञ प्रो. महाजन का कहना है कि जोशीमठ का उदाहरण हमारे सामने है, जहां भूमि में पानी की मात्रा अत्यधिक थी, और जब दरारें आईं, तो पानी सतह पर आ गया। यह समस्या विशेष रूप से बारिश के मौसम में अधिक गंभीर हो जाती है। पहाड़ी क्षेत्रों में जल निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण यह समस्या और बढ़ जाती है।विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों में शॉक पिट का सही तरह से निर्माण और रखरखाव नहीं किया गया है, जिससे भूमि की स्थिरता प्रभावित होती है। इसके अलावा, सेप्टिक टैंक और अव्यवस्थित जल निकासी प्रणाली भी भूस्खलन की समस्या को बढ़ावा देते हैं। पिछले वर्ष भी इसी कारण से जिले के कई इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं सामने आई थीं, जिससे स्थानीय आबादी को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

धर्मशाला से मैक्लोडगंज तक सड़क पूरी तरह क्षतिग्रस्त

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून में 28 वर्षों तक वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत रहे प्रो. अंबरीश कुमार महाजन ने कहा कि धर्मशाला से मैक्लोडगंज तक की पूरी सड़क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस क्षति का प्रमुख कारण भूमि में अधिक पानी का मौजूद होना है। यह समस्या खासतौर पर बरसात के मौसम में गंभीर हो जाती है, क्योंकि अन्य मौसमों में पानी धीरे-धीरे सूख जाता है, लेकिन बारिश के दौरान यह पानी भूमि के अंदर जमा हो जाता है, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।

समस्या के कारण और निवारण

भूस्खलन और सड़क क्षति जैसी समस्याओं से बचने के लिए वैज्ञानिकों और भू-विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जल निकासी प्रणाली को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। सड़कों के किनारे उचित ड्रेनेज सिस्टम होना चाहिए, जिससे कि बारिश का पानी भूमि के अंदर समाने के बजाय बाहर निकल जाए और ढलानों पर पानी का दबाव न बढ़े।इसके अलावा, अवैज्ञानिक रूप से की जा रही निर्माण गतिविधियों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अक्सर पहाड़ों में सड़कों और इमारतों के निर्माण के दौरान उचित भूवैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया जाता, जिससे भूमि अस्थिर हो जाती है। यदि इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाए और भूगर्भीय रिपोर्ट्स को गंभीरता से लिया जाए, तो इन समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

भविष्य में संभावित खतरों को रोकने के लिए ठोस कदम आवश्यक

प्रो. महाजन का कहना है कि भविष्य में किसी भी बड़ी आपदा से बचने के लिए भू-वैज्ञानिकों की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार, स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों को मिलकर एक ठोस नीति बनानी चाहिए, जिससे पहाड़ी इलाकों में होने वाले भूस्खलन और भूमि धंसने की घटनाओं को रोका जा सके।

इसके अलावा, जल निकासी प्रणाली को मजबूत करने के साथ-साथ पुराने और अस्थिर निर्माणों का निरीक्षण किया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में भूमि अस्थिर पाई जाती है, तो वहां निर्माण गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

जोशीमठ जैसी आपदाएं हमें यह सीख देती हैं कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव भयावह हो सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक अनुसंधान और भूगर्भीय अध्ययन के आधार पर नीतियों का क्रियान्वयन करना न केवल आवश्यक है, बल्कि एक अनिवार्यता भी है।

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